पिता की मृत्यु के बाद
माँ बहुत रोती है पिताजी
बेटा दफ्तर जाते समय
न मिले तो / आंसू
पोता न सुने कहानी
घर में हो ब्याह
या जाया हो नाती
हर मौके बस रोती / माँ
आप जानते हो पिताजी
आपके खाने से पहले
खाती नहीं थी माँ
जब तक आपसे नहीं कर लेती थी तकरार
कहाँ शुरू होता था उसका दिन
आपका भी कहाँ लगता था मन
जब हो जाती थी नाराज
कितना मनाते थे आप
सुनाकर माँ को / मुझसे कहते थे-
' तेरी माँ का स्वभाव फूल सरीखा है
जो दूसरों को बांटकर सुगंध
बिख़र जाता है ख़ुद '
तब माँ फेर लेती थी पीढ़ा
और आँखों की कौर से
पौछती थी गीलापन
जब से आप गए हो / पिताजी
बैठी रहती है आपकी तस्वीर के आगे
बिना कुछ खाए पिए
काट देती है सारा दिन
माँ की आँखों से
हंसी ख़ुशी उदासी की
जो त्रिवेणी बहती है
कभी पलट कर देखो तो सही / पिताजी
पोते को हँसता बोलता देखकर
कभी कभी रोते हुए माँ
कहती है धीरे से -
' तेरे पिता हंस रहे हैं '
पर आप पहले की तरह
सिर्फ माँ के लिए
कब हंसोगे पिताजी
*
Friday, 4 December 2009
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
मार्मिक रचना पर बहुत सुन्दर!
ReplyDeleteजैसा मैंने मेरी माँ को देखा है इन दिनों ठीक वैसी ही कविता और क्या कहूं
ReplyDeleteमां शब्द ही ऐसा है. दुनिया के सभी शब्दकोशों को मिलाकर भी इसके बराबर कुछ हो नही सकता.फूल सा जटिल पर खुशबू सा सरल.
ReplyDeleteकविता भी मां का सा स्पर्श देती है.
पद्मजा जी ये शब्द ही अपने आप में पर्याप्त है.कैसे बँट जाती है माँ पति और बच्चों के बीच और फिर भी सामंजस्य भी बनाये रखती है.जितना भी लिखें कम ही पड़ेगा. मन को भिगो गयी ये रचना. मेरे ब्लॉग पर माँ पर एक कविता है पर वो माँ की कुछ अलग ही मनस्थिति दर्शाती है कविता का शीर्षक है "आज भी ".समय मिले तो जरूर पढियेगा
ReplyDeleteसादर रचना दीक्षित
अनुभूति की अमूल्य थाती सँजोकर निकले हैं यह शब्द ! माँ के आँसुओं और पिता की हँसी के बीच ठहर गयी संवेदना ।
ReplyDeleteमार्मिक व सुन्दर कविता । आभार ।
पद्मजा जी !
ReplyDeleteजाने क्यों बड़ा भावुक हो चला हूँ ...
ऐसी कविता की शान में शब्द रखना मौन-संवेदना
का अपमान सा लगता है ... माँ जिसके सामने ---
'' पुत्रो कुपुत्रो जातः क्वचिदपि कुमाता न भवति '' की स्थिति हो , वहां शब्द
कहाँ ठहरेंगे ... मैं माँ से दूर हूँ और सिर्फ यादें आ रही हैं ...
डा. पदमजा साहिबा,
ReplyDelete'पिताजी और मां' से रिश्तों की पेशकश में,
बडा ही मर्मस्पर्शी संतुलन बनाया है आपने.
सच कहें, आंखें नम हो गयीं..
ये रिश्ते ही ऐसे होते हैं..
वाकई
छांव घनेरे पेड सी देकर, धूप दुखों की सहती मां.
एक समन्दर ममता का है, फिर भी कितनी प्यासी मां..
अलबत्ता जीवन में पिताजी के महत्व को कौन नकार सकता है?
उनकी कमी को कौन पूरा कर सकता है?
शायद कोई नहीं !
और कभी नहीं !!
शाहिद मिर्ज़ा शाहिद
पिता के जाने के बाद मां को देखकर ही आंसू रोक लेने होते हैं ...माँ का भीगा प्यार पिता को कभी भुलाने नहीं देता ...
ReplyDeleteमन को छू गयी ये कविता पिता की याद दिलाती ...!!
नए अर्थ गढ़ती कविता है यह... उम्र के साथ माँ को देखने की दृष्टि भी बदल जाती है... जहाँ तीसरी क्लास में लिखते है - माँ भोली होती है, प्यारी होती है, खाना बनती है.... वोही आठवी में - माँ ममता की मूरत होती है, स्नेह्दयिनी होती है, त्याग करने वाली होती है... फिर पी. एच. डी. करने पर यह रंग भी फबने लगते हैं...
ReplyDeleteशाहिद जी
ReplyDeleteआपने इन शब्दों -
'छांव घनेरे पेड सी देकर, धूप दुखों की सहती मां.
एक समन्दर ममता का है, फिर भी कितनी प्यासी मां'
-में बड़ी बात कह दी .विरोधाभास औरत के साथ रहता ही है .
मार्मिक ...... आँखों को नम कर गयी आपकी रचना .... हर शब्द जैसे दिल को चीर कर लिखा हुवा ....
ReplyDeleteदिल को छू गई आपकी रचना , माता - पिता में तकरार होता रहता है लेकिन प्यार बहुत होता है ।
ReplyDeleteक्या लिखूं समझ नहीं आ रहा. गला भर आया और ऑंखें नम. फिर वही बात मार्मिक और दिल को छूने वाली कविता है.
ReplyDeleteएक बात आपकी पहले वाली कविता ' सुलोचना रांगेय राघव के लिए' पर लिखना चाह रहा था किन्तु संकोच वश लिख नहीं पाया परन्तु रहा भी नहीं गया सो पूछना चाहता हूँ की क्या आपने उनके माद्यम से अपने दिल की बात तो नहीं कही.
जब से आप गए हो / पिताजी
ReplyDeleteबैठी रहती है आपकी तस्वीर के आगे
बिना कुछ खाए पिए
काट देती है सारा दिन ।
-चुनती है जितना उतना ही रोती
गमों के सागर से यादों के मोती
न जागी न सोती
रात भर
भींगती रहती है माँ।
-आपकी कविता ने माँ की याद ताजा कर दी।
अशोक जी ,
ReplyDeleteमुझे लगता है कि कोई भी रचना निजी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति होती है .कहने वाले का 'निज' उस से पूरी तरह से अलग तो नहीं ही हो सकता . ख़ासकर कविता में . लिखने वाले के अपने सपने , जीवन के संघर्ष , भाव , अनुभूतियाँ , इच्छाएँ , प्रेम दूसरे के साथ मिल जाते हैं . जैसे दो नदियों का पानी . फिर आप उसे अलग नहीं कर सकते .
मैं सचमुच नहीं बता सकती कि मैं यहाँ हूँ या नहीं . क्योंकि वह कविता तो सुलोचना जी के लिए ही लिखी थी . उनसे मिलने के बाद .
मुझे किसी बड़े लेखक के कहे शब्द कुछ कुछ याद आ रहे हैं कि- लेखक यथार्थ के साथ ही अपनी रचनाओं में एक ऐसा परिवेश भी रचता है जिसमें उसकी उन आकांक्षाओं और सपनों के लिए भी जगह होती है जो सच नहीं हो पाए -. सो कैसे कहूँ कि मैं हूँ ही नहीं . और कैसे कहूँ कि मैं हूँ .
आखिर में यही कि- ' कविता को गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह किसी सच का बयान नहीं करती है '. यह सुकरात ( शायद )का कहना है .
इस भावुक कर देने वाली रचना की मार्मिकता महसूस ही की जा सकती है.
ReplyDeleteएक अच्छी कविता पढ़कर मन प्रसन्न हुआ
Bhavpurn aur sundar abhivyakti.Shubkamnayen.
ReplyDeleteबहुत ही मार्मिक और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! दिल को छू गई आपकी ये रचना! माँ पिताजी में अटूट प्यार होता है चाहे दोनों के बीच तकरार क्यूँ न हो!
ReplyDeleteपहले किशोर जी के ब्लौग पर लगी कविता ने मेरा ध्यान खींचा और फिर आज संजय व्यास जी के पोस्ट पर आपकी टिप्पणी ने रही-सही कसर पूरी कर दी तो मैं चला आया पढ़ने आपको।
ReplyDelete...और जब कुछेक कवितायें पढ़ ली तो लगा कि अब तक न पढ़कर खुद अपना ही नुकसान कर रहा था मैं तो। मार्क कर लिया है अब से भविष्य के लिये!
गौतम
ReplyDeleteआपका स्वागत है . मेरी रचनाओं ने आप जैसे सहृदय का ध्यान अपनी ओर खींचा . जानकर अच्छा लगा .
बहुत ही भावपूर्ण रचना पिता के जाने के बाद माँ की मन:स्थिति का इससे अच्छा वर्णन हो ही नही सकता । खास कर ये लाइने तो
ReplyDeleteपोते को हँसता बोलता देखकर
कभी कभी रोते हुए माँ
कहती है धीरे से -
' तेरे पिता हंस रहे हैं '
पर आप पहले की तरह
सिर्फ माँ के लिए
कब हंसोगे पिताजी
रुला गईं ।
पर आप पहले की तरह
ReplyDeleteसिर्फ माँ के लिए
कब हंसोगे पिताजी
bahut hi marmsparshi rachana.
Man mein halchal kar gayee...
beautiful poem .
ReplyDeleteसचमुच मां के भीतर जीवित पिता ही घर को प्रवाहमान रखते है। बहुत भावुक करने वाली कविता ।
ReplyDeleteआपको पत्रिकाओं में अक्सर पढती हूं। अब हमेशा ही पढूंगी।
माँ की आँखों से
ReplyDeleteहंसी ख़ुशी उदासी की
जो त्रिवेणी बहती है
कभी पलट कर देखो तो सही / पिताजी
आदणीय पद्मजा जी।
नमस्कार!
मानो किसी कलाकार ने समन्दर को तरास दिया हो, पथ्थर को तो तरासते देखा था मैंने पर आपने समन्दर को अपने शब्दों में गढ़ दिया है। "हंसी ख़ुशी उदासी की - जो त्रिवेणी बहती है" सुन्दर अति सुन्दर। जल्द ही आपका kavimanch.in पर स्वागत करूँगा। शम्भु चौधरी
behad bhavbhini rachna.man ko choonewali.
ReplyDeleteबहुत सुंदर कविता हैं ।
ReplyDelete