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Thursday, 10 December 2009

कविता

सुनसान इलाके और लड़कियां


लड़कियां
हमेशा चलती हैं
बच कर भीड़ से

कतराती हैं लम्बे रास्तों से
अंधेरों से घबरातीं
उजालों से जाती हैं सहम
लड़कियां

सुनसान इलाकों की कल्पना तक से
सिहर जातीं
एकांत में पत्तों की सरसराहट तक से
जाती हैं चौंक
लड़कियां

राह चलते रुक जाती हैं
किसी अजाने भय से
मोड़ पर मुड़ने से पहले ठिठकती हैं
लड़कियां

डरते हुए करती हैं पार
सड़क

घर में घुसने के बाद भी
क्या चैन की साँस ले पाती हैं
लड़कियाँ

46 comments:

  1. ऑफ़ कोर्स ! नॉट

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  2. मैं तो कहुंगा कि-

    कंधे से कंधा मिलाकर
    खड़ी हैं लड़कियां
    कई स्थानों पर
    लड़कों से बड़ी हैं लड़कियां

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  3. ladkiyon ki chintaon , dar ka bakhubi varnan kiya hai.

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  4. पद्मजा जी !
    सदियों से निर्मित अवचेतन में डर का ही प्राधान्य रहा है ..
    आज जब निर्भरता की रोशनी भी उसके पास आती है तो
    वह सहमती है ''उजालों से जाती हैं सहम
    लड़कियां '' क्योंकि हर आगत को ससंदेह देखना उसकी
    चेतना का अवशेषी - अंग बन/बना दिया गया है ..
    सारी अनुचित हदों को पार करने में डर उनके साथ है क्योंकि
    'चैन की साँस ले सकें ऐसा घर' उनके साथ नहीं है ..
    काबिलेतारीफ ... ...

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  5. कविता एक सच को बयाँ कर रही है. आपकी कविता समाज और इंसान से जुड़ी हुई होती है .

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  6. पदमजा जी ..........
    आपकी कविता सच का आईना है ...... हाँलाकि आज लड़कियाँ हर जगह कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं .... कठिन से कठिन राह भी अकेले पार कर रहीं हैं पर फिर भी पुरुष दंभ उसे घर में भी चैन नही लेने देता ........... अच्छी अभिव्यक्ति है ...

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  7. कविता की आखिरी पंक्तियाँ ध्यान से पढ़ने की जरूरत है इसलिए मैंने इसे फिर से पढ़ा तो लगा कि कहाँ आ गया हूँ साथ बहते हुए "डेड एंड" पर. आपकी कविताओं की इन्हीं खूबियों ने दीवाना बना रखा है.

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  8. बेहद प्रभावी कविता । अंत तो सच में मारक है । आभार ।

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  9. क्या आपको अब भी लगता है की स्तिथि इतनी ख़राब है. मैं भी सोचता था की अब तो काफी बदलाव आया है किन्तु दुबारा सोचने से लगता है कि कहीं हम बद से बदतर तो नहीं हो रहे हैं.

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  10. लड़कियों के अंजाने भय को साकार कर दिया आपकी कविता ने ...जो इतना अंजाना भी नही होता ...जीवन के किसी न किसी मोड़ पर इस भय का सामना करती ही हैं लड़कियाँ ... !!

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  11. बेहद सहमी सहमी रहती है लड़कियां
    मां के गर्भ में भी.

    कविता समाज के एक बड़े सच को सामने रखती है.अंतिम पंक्‍ति में ये सच और मुखर हो उठता है.

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  12. बहुत ही खूबसूरत अभिव्यक्ति है और साथ ही सोचने को मजबूर करती है. अपनी एक कविता आपकी कविता को भेंट कर रही हूँ .
    आभार

    सृष्टि


    जब चाँद कभी झुक जाता है

    और बादल को गले लगाता है

    जब कोई कहीं शर्माता है

    और झूम-झूम वो जाता है

    तो बारिश का महीना आता है



    जब कोई याद किसी को करता है

    और सारा इतिहास गुजरता है

    जब वक़्त कहीं पे ठहरता है

    और आँखों से निर्झर बहता है

    तो सावन का महीना आता है



    जब नन्ही आँखों में कोई सुंदर सपने संजोता है

    और कागज़ की कश्ती को ले कोठे पे दौड़ा जाता है

    जब इन नन्ही आँखों को करने को कुछ न रह जाता है

    तो रिमझिम का महीना आता है



    जब अपनी बिटिया रानी का इक अच्छा रिश्ता आता है

    और उस रिश्ते की खातिर इक गांठ लगाया जाता है

    जब ख़ुशी-ख़ुशी गुडिया रानी के सपने को सजाया जाता है

    और उसे प्रीतम के संग डोली में बिठाया जाता है

    तो वृष्टि का महीना आता है



    जब कामुकता को हद से बढ़ाया जाता है

    और वो विकराल रूप ले आता है

    जब अपनी ही बिटिया को बाप अपने पास बुलाता है

    फिर उस पे बुरी नज़र दौड़ाता है

    तो सृष्टि को पसीना आता है

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  13. हकिकत बयां कर दी... सरल शब्दों में..

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  14. बहुत ही अच्‍छी कविता लिखी है
    आपने काबिलेतारीफ बेहतरीन


    SANJAY KUMAR
    HARYANA
    http://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  15. रचना जी
    आप तो रचना का जवाब रचना में देकर ब्लॉग में रच गयी हैं .अच्छा लगा . कविता में बिटिया को लेकर इतने खूबसूरत ख्यालों के साथ चलते चलते एका एक सब कुछ उलट हो गया .

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  16. aapki kavitaon men aksar ladkiyon ke dar , dukh dard hi adhik aate hain . kyon ?

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  17. वाह ! लड़कियों की दशा का ऐसा यथार्थ चित्रण, बहुत कम जगह दिखाई देता है , आपकी संवेदनाओं को प्रणाम .. लगता है आप की सशक्त लिखनी बहुत कुछ देंगी समाज को !
    सादर

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  18. mein yahi kahoongi... " beautiful thought-provoking poem"

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  19. actually jab mein mumbai mein thi tab mujhe yeh opportunity mili thi but abhi mein jaipur mein hoon & rahi baat buzurgo ke ashram ki toh yeh log toh apne khud ke ghar mein bhi achhi condition mein nahi hain.... i mean they are not treated well.Even we subscribe this magzine " Madhumati" & thanks a lot for your encouragement ... looking forward for ur valuable suggestions...

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  20. घर में घुसने के बाद भी
    क्या चैन की साँस ले पाती हैं
    लड़कियाँ
    --vah apane ladkiyon ke dard ko behad sahajata se ukera hai.

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  21. premwahi@yahoo.com | Dashboard | My Account | Help | Sign outSamarpanPostingSettingsLayoutMonetizeView BlogNew PostEdit PostsComment ModerationAre you sure you want to delete this post?
    आज के बड़े शहरों की लड़कियां आपसे इतफाक नहीं करेंगी ,हमारे ज़माने की आवाज़ में खूब जमती हैं ,रचना अपने में बहुत सुंदर है । टैगोर की सुंदर पंक्तियों का आनंद देने का शुक्रिया ।aapki rachna hamen to achchi lagi,aaj ki girls nahin manengi.




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  22. यह कविता सच्चाई का आइना है । लडकियो को कम्जोर हमारे वर्तमान समाज ने बनाया है वरना लडकियो मे आज भी मा दुर्गा का रूप है ।

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  23. This comment has been removed by the author.

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  24. उफ़्फ़्फ़...कविता की अंतिम पंक्तियों ने एकदम से कविता को खास बना दिया। पंच-लाइन या क्लाइमेक्स कहूँ इसे...एक कविता की अपने पाठकों तक पहुँच को सफल बनाती हुई।

    बहुत सुंदर मैम।

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  25. आपकी सारी रचनाये ब्लॉग पर दुबारा पढ़ी. यही सोचता रहा कि इनमें खास क्या है. मुझे दो बातें विशेष लगी. एक आप अपनी रचनाओं में अंत को बहुत अच्छे से संभाल लेती हैं. अक्सर देखा गया है कि अच्छे अच्छे लेखक भी अपनी रचनाओं कि सुरुआत बहुत सुंदर तरीके से करते हैं बीच में भी संभाल लेते हैं किन्तु अंत तक आते आते बिखर जाते हैं. दूसरी बात भी अंत पर ही है जो आप अंत में एक प्यारा सो मोड़ देते हो वह सोने में सुहागे सा काम करता है. English में कहूँ तो ' Twist in the tail'.  येही twist अंततः रचना कि जान बन जाता है और  दिमाग को जझ्कोर देता है.

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  26. This comment has been removed by the author.

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  27. bahut bada sach hai ye padmajaa jee. taareef ke liye shabd nahee hain mere paas.

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  28. Really this is fact but behind the problem not only society or social mentality are responsible but the almighty god also really responsible for the problem, and feminine themselves are bigger responsible for the condition.good poem congratulations

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  29. वाकई में जो लड़की है उसके लिए भय इस समाज में हर तरफ व्याप्त है.......
    कितने भी कदम
    बच क चले
    फिर भी
    प्रश्नों में
    कैद हैं लड़कियाँ......

    सच पूछियें तो आज तो उन्हें गर्भ में भी चैन नही हैं.......
    और इसी का आईना बनी है आपकी ये रचना.....

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  30. इतनी तरक्की की है लडकियों ने फिर भी लडकियों की सुरक्षा को लेकर हमारा समाज इतना नाकारा क्यूं है ? आपकी कविता का अंत कि
    घर में घुसने के बाद भी
    क्या चैन की साँस ले पाती हैं
    लड़कियाँ बहुत जायज है ।

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  31. Kavita kaphi prabhav chodti hai.

    Nav varsh ki dheron shubkamnayen.

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  32. happy new year may God bless you with all the success in life .

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  33. This is really great creation. Congratulations for such a poetry. Best wishes.

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  34. I am agreeable to Padamjaji as the Girls are not safe even in their own homes, I need not to quote everyday's Newspaper Headlines but would say further by my Muktak:

    "Dhalte sooraj si khadi hain ladkiyan
    apne ghar ki sabse badi hain ladkiyan
    dahej ke danvo se umar chhipaye kaise
    kunwari rehne ki jid per adi hain ladkiyan"

    sktyagi10@yahoo.com

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  35. कहाँ हैं आप ? होली और मिलाद उन नबी की शुभकामनायें !

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  36. होली की सतरंगी शुभकामनायें |
    बहुत दिन हो गये कुछ लिखिये ।

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  37. घर में घुसने के बाद भी
    क्या चैन की साँस ले पाती हैं
    लड़कियाँ
    purush jab akele mein aaine ke samne apne ko nanga dekhta hai ..aise prasno kaa samna kerta hai to aaine ko fodne ki aaine ke kharab hone ki baat hi adhik kerke apne dambh ko bachata hai ..magar ye prasn use todne ke liye kafi hai ..bajay ke hum dur ko ladkiyon se jodker apne aham ko tusht kere hame apne kroor hone ka ahsas jo bhiter kahi kachotta hai use khulker man lena chahiye v ab ek alag soch ki jameen tyar kerni chahiye .....prasn wakai jakjhorta hai ....

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  38. भुत अच्छा लिखा है आपने

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  39. रचना पर्याप्त यथार्थ की अभिव्यक्ति है ।
    उत्कृष्ट ।

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  40. im a college stdnt, so i knw the truth.....bahut kuchh sach hai, but gals r srong too. Mam plz write tht part too.

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  41. आदरणीया डॉ. पदमजा शर्मा जी
    नमस्कार !
    बहुत विलंब से पहुंचा हूं , लेकिन एक अच्छी कविता के लिए आभार स्वीकार करें ।

    घर में घुसने के बाद भी
    क्या चैन की सांस ले पाती हैं
    लड़कियां

    विचारणीय पक्ष है …

    कृपया , अब संभव हो तो कुछ नया पढ़ने का अवसर दें ।
    शुभकामनाओं सहित
    - राजेन्द्र स्वर्णकार

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  43. bahut achha likha hai aap ne bahut - bahut shubhkamna

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