अन्य ब्लॉग

Saturday, 28 November 2009

कविता

सुलोचना रांगेय  राघव के लिए

आपके भीतर
ढलती उम्र में
पिछली एक उम्र ठहरी है
जहाँ नटखट प्रेमिल युवती
ख़ामोश बैठी है
अपने सम्पूर्ण समर्पण / शोखियों के साथ

अवसर मिलते ही
हिरणी सी कुलांचे भरती
गुलाबों सी खिलती
ताज़ा हवा सी बहती
एक रस / एक तान ज़िंदगी में
कई रंग भरती

शाम सी उतरती धरती पर
रात सी मिलती गले
भोर सी लेती अंगड़ाई
किरणों सी बिखरती
चांदनी सी झरती
पत्तों सी सरसराती
शिशु सी कुनमुनाती
और औचक ही लजा जाती 

सहज , सरल ,सीधी , निश्छल
नदी सी बहने को
बहुत कुछ कहने को उतावली सी

जाने कैसे तो उड़ती है आकाश में / बहुत ऊँचे
और बुनती  है सपनों के इन्द्रधनुष

सुगंध सी घुलकर हवा में
लौट आती है चुपचाप
धरती पर लड़की
         -.-       

27 comments:

  1. सहज , सरल ,सीधी , निश्छल
    नदी सी बहने को
    बहुत कुछ कहने को उतावली सी

    भावपूर्ण लाइनें,सहज तरीका

    ReplyDelete
  2. अतीत की सुगंध
    अल्हड लडकपन के अधूरे सपने
    और न जाने क्या क्या
    यानी
    कितना कुछ समेट दिया चंद पंक्तियों में
    यही कशिश तो खींच लाती है यहां
    और हमें इंतजार रहता है
    एक और
    एक और नई रचना का...
    शाहिद मिर्ज़ा शाहिद

    ReplyDelete
  3. अवसर मिलते ही
    हिरणी सी कुलांचे भरती
    गुलाबों सी खिलती
    ताज़ा हवा सी बहती
    एक रस / एक तान ज़िंदगी में
    कई रंग भरती
    bahut hi khubsurat kavita.....

    ReplyDelete
  4. कविता बहुत सुंदर है.
    कई बार इसको पढ़ा तो सौन्दर्य ही मुझे पर छाया रहा, मैंने कुछ कविताएं विशिष्ट और सामान्य व्यक्तियों को समर्पित पढी है परन्तु ये सबसे अलग.

    ReplyDelete
  5. सुगंध सी घुलकर हवा में
    लौट आती है चुपचाप
    धरती पर लड़की
    -.-
    और स्त्री के हर रूप /हर ओहदे में ताउम्र ज़िंदा रहती है ये लड़की ...

    ReplyDelete
  6. kavita kya aapne to ek stri ke man ke un bhavon ko shabd de diye jo wo apne antas mein chupaye zindagi gujaar deti hai..........varna armaan to wahan bhi palte hain,sapne to wo aankhein bhi dekhti hain.

    ReplyDelete
  7. पिछले साल तक नियमित रहा , अब पुनः अंतर्जाल पर उपस्थित हुआ हूँ.लेकिन अफ़सोस आपकी तरफ आना न हुआ.जब आया तो बस जाने का मन न करता है.बहुत ही व्यवस्थित लेखन है आपका..यही दुआ है, जोर-ए-कलम और ज्यादा! कभी मौक़ा मिले तो खाकसार के ठिकाने पर भी आयें, हौसला अफजाई होगी.

    ReplyDelete
  8. बहुत सधी और सीधी शैली है बात कहने की, आपकी. बहुत सुन्दर.

    ReplyDelete
  9. bahut hee sunder ehsaas liye hai aapakee ye kavita . Badhai

    ReplyDelete
  10. सुन्दर कविता ...
    .........कुछ ख्याल जीवन भर रहते हैं और
    ऐसे ही उम्र का एक खास पड़ाव
    जीवन भर रहता है ...
    ............आभार .........

    ReplyDelete
  11. ढलती उम्र में
    पिछली एक उम्र ठहरी है
    जहाँ नटखट प्रेमिल युवती
    ख़ामोश बैठी है ......

    सपनो के माध्यम से मान के कोमल क्षण बाखूबी उतारे हैं आपने इस रचना में .......... लाजवाब रचना है ......

    ReplyDelete
  12. सुन्दर बढ़िया तरीके से आपने अपनी बात कही है ..बहुत पसंद आया आपका लेखन शुक्रिया

    ReplyDelete
  13. बहुत बचपन से ही चुप्‍पा रहने की हिदायत के चलते ये शोख रूप कम ही बाहर आ पाता है पर बहुत बाद तक भी मौका मिलने पर कुलांचे भरने को आतुर रहता है.
    अन्‍तरस्‍पर्शी.सुंदर.

    ReplyDelete
  14. अवसर मिलते ही
    हिरणी सी कुलांचे भरती
    गुलाबों सी खिलती
    ताज़ा हवा सी बहती
    एक रस / एक तान ज़िंदगी में
    कई रंग भरती
    bahut saralata se kah daali apne bhav is rachna ne aapki

    ReplyDelete
  15. बहुत अच्छी रचना है। भाव, विचार और शिल्प सभी प्रभावित करते हैं। सार्थक और सारगर्भित प्रस्तुति ।

    मैने अपने ब्लग पर एक कविता लिखी है-रूप जगाए इच्छाएं-समय हो पढ़ें और कमेंट भी दें ।- http://drashokpriyaranjan.blogspot.com

    गद्य रचनाओं के लिए भी मेरा ब्लाग है। इस पर एक लेख-घरेलू हिंसा से लहूलुहान महिलाओं को तन और मन लिखा है-समय हो तो पढ़ें और अपनी राय भी दें ।-
    http://www.ashokvichar.blogspot.com

    ReplyDelete
  16. रात सी मिलती गले
    भोर सी लेती अंगड़ाई
    किरणों सी बिखरती
    चांदनी सी झरती
    पत्तों सी सरसराती
    शिशु सी कुनमुनाती
    और औचक ही लजा जाती
    ---सुंदर वर्णन.. मोहक कविता... बधाई।

    ReplyDelete
  17. बेहतरीन रचना पढ़कर मन प्रसन्न हो जाता है

    ReplyDelete
  18. beeta vakt bheetar zinda rahe to zindagi khoobsoorat bani rahti hai........baki nazar ki baat hai.........achchhi rachna ke liye shukriya........

    ReplyDelete
  19. शाम सी उतरती धरती पर
    रात सी मिलती गले
    भोर सी लेती अंगड़ाई
    किरणों सी बिखरती
    चांदनी सी झरती
    पत्तों सी सरसराती
    शिशु सी कुनमुनाती
    और औचक ही लजा जाती
    बहुत सुंदर अभिव्यक्ति कितना कुछ कह दिया
    आभार

    ReplyDelete
  20. नयी कवितायेँ भी उतनी ही मर्मस्पर्शी है जितनी पहले लिखी थी. आपकी अभिवय्कती सच में कमाल की है.

    ReplyDelete
  21. main yahan aage aakar rachna padh chuki hoon magar tippani box na khulne karan rai na de saki phir dhyaan se utar gaya ,aap bahut sundar likhti hai ,kishore ji blog par gayi unki kahani par tippani dene magar aapki waha jo rachna likhi hai use padh itni bhavuk ho gayi ki aap ki rachna ke liye wahan comments kar aai ,man ko chhu gayi wo baat jo us rachna me hai .ढलती उम्र में
    पिछली एक उम्र ठहरी है
    जहाँ नटखट प्रेमिल युवती
    ख़ामोश बैठी है ......yahan bhi wahi baat hai ,mere blog par aapke mile salah par gaur karungi ,shukriya

    ReplyDelete
  22. sorry aage dekhi nahi tippani kar gayi thi wahi main sochi aesi bhool hui kaise ,

    ReplyDelete
  23. ज्योति जी
    कई भूलें बड़ी प्यारी होती हैं .आपकी भूल मेरे लिए खुशी का कारण है .ऐसी भूल कम ही होती है और जब होती है तो सामने वाले का मन खिल उठता है .आगे होने वाली ऐसी कई भूलों का यहाँ अभिनंदन .

    ReplyDelete
  24. बहुत सुंदर ।

    ReplyDelete
  25. सुलोचना जी से मिलने का सौभाग्य मुझे मिला है और आप्ने उन पर इतनी सरल सहज और सुलझी कविता लिखकर उनकी याद दिला दी.

    पिच्ह्ले दिनो मैने रान्गेय राघव जी पर एक पोस्ट लिखी थी.
    http://hariprasadsharma.blogspot.com/2010/01/blog-post_17.html

    हरि शर्मा
    जोधपुर
    ९००१८९६०७९

    ReplyDelete
  26. कविता नदी सी प्रवहमान ।

    ReplyDelete