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Thursday, 5 November 2009

क्षणिकाएं

अधर में लड़कियाँ

उड़ा रही हैं हवाई जहाज
छू लिया है आसमान
चाँद पर भी पहुँच रही हैं
लड़कियाँ

मगर धरती पर
कहाँ टिका पा रही हैं
पाँव
लड़कियाँ .

लड़की का कद

बड़ी होती लड़की
नापती है अपना कद
माँ के कद से

ऊँची होकर हर बार
बजाती है तालियाँ
ख़ुशी में

बढ़ती लड़की नहीं जानती कि
माँ
उसकी उम्र में थीं  उस से लम्बी

जैसे जैसे बढ़ती गई उनकी  आयु
घटती  गई
ऊंचाई .

प्रेम

लड़कियाँ कर रही हैं प्रेम
लिख रही हैं प्रेम पत्र

उनकी किताबों से झड़  रही हैं
गुलाब की पंखुडियाँ

वे झांक रही हैं खिड़कियों से
लड़कों की  दुनिया में

क्या
वहां बचा है अब भी
प्रेम .

Monday, 2 November 2009

लघु कथा

                                                   आशीष

वह ईमानदार और काबिल चिकित्सक था .  पिता चपरासी थे .  आर्थिक तंगी के बावजूद उसने अपने बहन भाइयों के ठीक ठाक  से विवाह किये . माल प्रैक्टिस  में उसका विश्वास नहीं था  . शायद इसी से अब तक रहने के लिए घर सरीखा घर भी नहीं बनवा पाया था .
परेशान वह कभी ज्योतिषी को अपनी जन्म पत्री दिखाता . कभी मंदिर में तेल चढाता तो कभी घी . वास्तुकार के निर्देशानुसार कभी चेंबर बदलता तो कभी उसमें बैठने कि दिशा  .पर बात नहीं बनी .
किसी सुबह एक ग्रामीण वृद्ध मरीज आया .उसनें जांचा . पर्ची पर दवाइयाँ लिख दीं .
दोपहर को चिकित्सक की पत्नी बेटे को विद्यालय से लाने के लिए घर से निकली . देखा वह ग्रामीण सिर झुकाए पेड़ तले बैठा है . उसे आश्चर्य हुआ .  बड़े आदर से उसने पूछा --
' बाबा यहाँ क्यों बैठे हो ? '
' बस का किराया चुकाकर दो सौ रूपये बचे थे . सौ रूपये साहब की फीस के दे दिए . दवाई के लिए पैसे पूरे नहीं हैं . गांव चला गया तो , दवा के लिए लौट नहीं पाउँगा . बस भाडा लगेगा . काम खोटी  होगा . क्या करूँ , यही सोच रहा हूँ . '
वृद्ध के बोलों में चिंता और गरीबी का कम्पन्न साफ सुनाई दे रहा था .
चिकित्सक कि पत्नी तत्काल भीतर गई . कुछ रूपये लाई . वृद्ध को दिए . रुपये देखकर उसकी आँखों से अविरल आंसू बहने लगे .उसने हज्जारों आशीषें  दीं और चला गया .
थोड़े दिनों में ही चिकित्सक के पास मरीजों की भीड़ पड़ने लगी . चिकित्सक को हैरत हो रही थी कि अचानक यह भीड़ . पत्नी ने पति को वृद्ध वाला किस्सा सुनाया . वह सब समझ गया .
चिकित्सक नें प्रण किया कि वह मरीजों से पैसे कम , आशीषें  ज्यादा लेगा .
तब से उसका काम और नाम दिन दूनीं  रात चौगुनी गति से बढ़ने लगा .

Thursday, 29 October 2009

कविता

मन
आँखें हैं
देख रहे हो

हाथ हैं
छू रहे हो

पांव हैं
चल रहे हो

मन है
मिल क्यों नहीं रहे ?

Wednesday, 28 October 2009

क्षणिकाएं.

 सदी के पार

आसमान छूने के हौंसले
सदी के पार जाने की  कल्पनाएँ
साथ लाते  हो
कभी छोड़ कर भी तो जाओ .


  याद में

जब थी प्यार में
रोई कि
तुम भूल गए तो ?

जब भूल गए
तो रोई
तुम्हारी याद में .

कविता

 सुन्दर दुनिया

पत्थर जोड़कर
बनाई इमारत
इतनी सुन्दर
देखो तो लगे
बोलती सी
इंसानों को जोड़कर
सुन्दर दुनिया
क्यों नहीं बनाता कोई .